जिनेवा,20 मई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रमुख डॉक्टर टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने पूर्वी कांगो में इबोला वायरस के पैमाने और गति पर चिंता व्यक्त की है। ये चिंता ऐसे वक्त सामने आई है, जब कांगो में इबोला वायरस से संक्रमित होकर 134 लोगों की मौत हो गई है और 500 से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आए हैं। बता दें कि डब्ल्यूएचओ ने इबोला प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है।
डॉ टेड्रोस ने बताया कि माना जा रहा है कि 130 से अधिक मौतें इस प्रकोप की वजह से हुई जुड़ी हैं, जबकि 500 से अधिक संदिग्ध मामले हैं। उन्होंने जिनेवा में वर्ल्ड हेल्थ असेंबली को संबोधित करते हुए कहा, इसके प्रभाव और प्रसार से ज्यादा मौतें होने की संभावना है। मामले अब केवल दूरदराज इलाकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी सामने आ रहे हैं। घनी आबादी वाले शहरों में संक्रमण फैलना चिंता का कारण है।
विशेषज्ञों ने इबोला के तेजी से फैलते मामलों के पीछे नए स्ट्रेन बंडीबुग्यो को जिम्मेदार माना है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पहली ज्ञात मौत के बाद हफ्तों तक वायरस का पता नहीं चल पाया, क्योंकि अधिकारियों ने इबोला के अधिक सामान्य प्रकार के लिए परीक्षण किया और सभी परिणाम नकारात्मक आए। जबकि ये बंडीबुग्यो वायरस के मामले थे। वायरस के इस नए स्ट्रेन के लिए कोई दवा या टीका उपलब्ध नहीं है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल रिसर्च के वायरस विशेषज्ञ जीन-जैक्स मुयम्बे ने कहा, कांगो को ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित किए गए विभिन्न प्रकार के इबोला के लिए एक प्रायोगिक टीके की खेप अमेरिका और ब्रिटेन से मिलने की उम्मीद है। कांगो में डब्ल्यूएचओ टीम की प्रमुख डॉक्टर ऐनी एंसिया ने कहा, एर्वेबो वैक्सीन, जिसका इस्तेमाल इबोला के एक अलग प्रकार के वेरिएंट के खिलाफ किया जाता है, संभावित उपयोग के लिए विचाराधीन टीकों में से एक है।
यूनिसेफ ने कहा कि उसे प्रारंभिक तौर पर 16 टन राहत सामग्री भेजी गई है, जिसमें मुख्य रूप से कीटाणुनाशक और साबुन, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और जल शोधन की गोलियां और पानी के टैंक शामिल हैं। यूनिसेफ की बुनिया ब्यूरो प्रमुख हेला स्खीरी ने कहा कि राहत सामग्री को इटुरी प्रांत के 3 केंद्रों में जरूरत के हिसाब से वितरित किया जाएगा। कांगो के इटुरी प्रांत की राजधानी बुनिया, गोमा और बुटेंबो के इलाकों में मामले सामने आए हैं।
इबोला वायरस पहली बार 1976 में अफ्रीका में सामने आया था। उस समय सूडान और तत्कालीन जायरे (अब कांगो) में इसके मामले मिले थे। यह संक्रमित व्यक्ति के खून, उल्टी और शरीर के दूसरे तरल पदार्थ के संपर्क से फैलता है। कांगो में कई बार इसके मामले सामने आ चुके हैं। अब ये इसका 17वां प्रकोप है। 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में इबोला से 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।
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