कुशीनगर, 21 मई (आरएनएस)। कृषि विभाग ने कृषकों से अपील किया है कि वे पर्यावरण के अनुकूल एवं वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाकर सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण एवं अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते है।
उक्त जानकारी जिला कृषि रक्षा अधिकारी डॉ0 मेनका ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में दी है। उन्होंने जनपद के कृषकों से अपील करते हुए कहा है कि फसलों में प्रति वर्ष कीट, रोग एवं खरपतवारों से होने वाली क्षति तथा कृषि रक्षा रसायनों के अविवेकपूर्ण प्रयोग से स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर पडऩे वाले प्रतिकूल प्रभावों को देखते हुए परम्परागत एवं वैज्ञानिक कृषि विधियों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है। मेडों की साफ-सफाई, ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई, भूमि शोधन एवं बीज शोधन जैसी विधियों को अपनाकर फसलों को सुरक्षित रखते हुए उत्पादन में वृद्धि तथा लागत में कमी लाई जा सकती है। इससे कृषकों की आय बढऩे के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी सहायता मिलती है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने बताया है कि खेतों की मेडों पर उगे खरपतवारों को नष्ट करने से हानिकारक कीट एवं सूक्ष्म जीवों के आश्रय समाप्त हो जाते हैं। जिससे अगली फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता है। साथ ही खेत में सिंचाई का जल संरक्षित रखने में भी सहायता मिलती है। उन्होंने बताया है कि ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करने से मृदा की संरचना में सुधार होता है तथा उसकी जलधारण क्षमता बढ़ती है, जो फसलों की बेहतर वृद्धि के लिए उपयोगी होती है। इससे मिट्टी में छिपे दीमक, सफेद गिडार, कटुआ, बीटल एवं मैगट जैसे हानिकारक कीटों के अंडे, लार्वा एवं प्यूपा नष्ट हो जाते हैं। साथ ही पथरचट्टा, जंगली चौलाई, दुध्दी, पान पत्ता, रसभरी एवं साँवा-मंकरा जैसे खरपतवारों के बीज तेज धूप के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। भूमि में वायु संचार बढऩे से लाभकारी सूक्ष्म जीवों की वृद्धि भी होती है।
भूमि शोधन के संबंध में उन्होंने बताया कि जैविक फफूंदनाशक ट्राइकोडर्मा 2.5 किलोग्राम मात्रा को 65 से 75 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर हल्का पानी छिड़कते हुए 8 से 10 दिन तक छाया में रखने के उपरांत अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देने से जड़ गलन, तना सडऩ, उकठा एवं झुलसा जैसे फफूंद जनित रोगों का प्रभाव कम होता है। इसी प्रकार ब्यूवेरिया बैसियाना 1 प्रतिशत डब्ल्यूपी बायोपेस्टीसाइड्स की 2.5 किलोग्राम मात्रा को गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग करने से दीमक, सफेद गिडार, कटवर्म एवं सूत्रकृमि का नियंत्रण किया जा सकता है। ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से मिट्टी में फास्फोरस, पोटाश एवं अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ती है तथा पौधों की जड़ों का विकास बेहतर होता है। उन्होंने कृषकों को सलाह दिया है कि बुवाई से पूर्व बीज शोधन अवश्य करें। इसके लिए प्रति किलोग्राम बीज पर 2.5 ग्राम थीरम 75 प्रतिशत डीएस अथवा 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी अथवा यथासंभव 4 से 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा का प्रयोग लाभकारी है। बीज शोधन से बीज सडऩ एवं बीजजनित रोगों जैसे बीज गलन एवं उकठा की रोकथाम होती है। जिससे अंकुरण अच्छा होता है। पौधे स्वस्थ रहते हैं तथा उत्पादन में वृद्धि होती है।
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