सरोवर में एक बूंद नहीं अमृत कैसा अमृत सरोवर
डिंडोरी 2 जून (आरएनएस)। देशभर में जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों को जल संकट से राहत दिलाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘मिशन अमृत सरोवरÓ आज कई स्थानों पर सवालों के घेरे में दिखाई दे रहा है। आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर शुरू की गई इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य गांव-गांव में जल संरक्षण के स्थायी साधन विकसित करना, भूजल स्तर बढ़ाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना था। लेकिन डिंडौरी जिले के अमरपुर विकासखंड सहित कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस योजना की जमीनी हकीकत सरकारी दावों से काफी अलग नजर आ रही है।
जल संरक्षण की बड़ी पहल
सरकार ने मिशन अमृत सरोवर के माध्यम से प्रत्येक जिले में कम से कम 75 तालाब विकसित करने का लक्ष्य रखा था। इन सरोवरों को केवल जल संग्रहण का माध्यम नहीं बल्कि ग्रामीण विकास के केंद्र के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई थी। योजना के तहत तालाबों के माध्यम से वर्षा जल संग्रहण, भूजल पुनर्भरण, सिंचाई सुविधा, मत्स्य पालन, बत्तख पालन, सब्जी उत्पादन और महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की रणनीति तैयार की गई थी।
सरकार का मानना था कि यदि गांवों में पर्याप्त जल भंडारण की व्यवस्था हो जाए तो किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होगा, ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा और महिलाएं स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बन सकेंगी। इसके लिए करोड़ों रुपये की राशि विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से खर्च की गई।
जमीनी हकीकत: गर्मी आते ही सूख जाते हैं तालाब
अमरपुर विकासखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ब्लॉक में बनाए गए अधिकांश अमृत सरोवर वर्तमान भीषण गर्मी में पूरी तरह सूख चुके हैं। कुछ चुनिंदा सरोवरों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश तालाबों में एक बूंद पानी तक नहीं बचा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इन सरोवरों का निर्माण बिना समुचित तकनीकी अध्ययन के किया गया। कई स्थानों पर प्राकृतिक नालों को रोककर तालाब बनाए गए, लेकिन उनकी तल सतह और पाल की मजबूती पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप बारिश का पानी कुछ महीनों तक तो रुकता है, लेकिन बाद में तेजी से रिसकर समाप्त हो जाता है।
ग्रामीण बताते हैं कि कई अमृत सरोवरों में जुलाई-अगस्त की बारिश के दौरान पर्याप्त जल भराव होता है, लेकिन फरवरी या मार्च आते-आते वे लगभग खाली हो जाते हैं। अप्रैल, मई और जून में इनका स्वरूप सामान्य गड्ढों जैसा रह जाता है। ऐसे में जल संरक्षण का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
तकनीकी खामियों पर उठ रहे सवाल
जल संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तालाब की सफलता उसके निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता पर निर्भर करती है। यदि तालाब की तल सतह, जल धारण क्षमता, कैचमेंट एरिया और जल निकासी व्यवस्था का सही आकलन न किया जाए तो वह लंबे समय तक पानी नहीं रोक सकता।
अमरपुर क्षेत्र के कई अमृत सरोवरों को लेकर आरोप है कि निर्माण के दौरान वैज्ञानिक मानकों का पालन नहीं किया गया। पटल भराई और जल रोकथाम संबंधी कार्यों में लापरवाही बरती गई, जिससे पानी का अत्यधिक रिसाव हो रहा है। यही कारण है कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद अधिकांश तालाब सालभर जल संरक्षण करने में असफल साबित हो रहे हैं।
महिला स्व-सहायता समूहों का सपना अधूरा:
मिशन अमृत सरोवर का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी था। योजना के अनुसार तालाबों को महिला समूहों को आवंटित किया जाना था ताकि वे मत्स्य पालन, सब्जी उत्पादन, जल आधारित कृषि और अन्य गतिविधियों के माध्यम से आय अर्जित कर सकें।
लेकिन जब तालाबों में पानी ही नहीं बच रहा है तो इन गतिविधियों का संचालन संभव नहीं हो पा रहा। लेकिन जल की उपलब्धता नहीं होने के कारण किसी प्रकार का उत्पादन सरोवर में नहीं हो पा रहा हैं। इससे आत्मनिर्भरता का सपना अधूरा रह गया है।
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि यदि तालाबों में सालभर पानी बना रहे तो मछली पालन और सब्जी उत्पादन जैसे कार्यों से अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह केवल कागजों तक सीमित दिखाई देता है।
जल संकट से जूझते गांव, खाली पड़े सरोवर
विडंबना यह है कि जिन क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई का संकट सबसे अधिक है, वहीं कई अमृत सरोवर गर्मी के मौसम में पूरी तरह सूखे दिखाई देते हैं। एक ओर ग्रामीण पानी के लिए कई किलोमीटर दूर तक भटकने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर जल संरक्षण के नाम पर बनाए गए सरोवर उपयोगहीन साबित हो रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य गुणवत्तापूर्ण तरीके से किया जाता और नियमित निगरानी होती तो इन सरोवरों से जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
जांच और मूल्यांकन की जरूरत
विशेषज्ञों और ग्रामीणों का मानना है कि मिशन अमृत सरोवर जैसी महत्वपूर्ण योजना की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन केवल निर्माण कार्य पूरा होने से नहीं बल्कि उसमें वर्षभर जल उपलब्धता, सिंचाई लाभ, भूजल स्तर में सुधार और स्थानीय लोगों को हुए आर्थिक लाभ के आधार पर किया जाना चाहिए।
यदि करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद अधिकांश तालाब गर्मी में सूख रहे हैं तो इसकी तकनीकी और प्रशासनिक जांच आवश्यक है। यह भी देखा जाना चाहिए कि निर्माण एजेंसियों द्वारा निर्धारित मानकों का पालन किया गया या नहीं तथा जल संरक्षण के लिए बनाई गई संरचनाएं वास्तव में प्रभावी हैं या नहीं।
निष्कर्ष
मिशन अमृत सरोवर की अवधारणा निस्संदेह सराहनीय है। जल संरक्षण, भूजल संवर्धन, ग्रामीण रोजगार और महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों को ध्यान में रखकर बनाई गई यह योजना ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की क्षमता रखती है। लेकिन अमरपुर विकासखंड सहित कई क्षेत्रों में दिखाई दे रही जमीनी स्थिति यह संकेत देती है कि योजना के क्रियान्वयन में गंभीर कमियां रही हैं।
जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अधिकांश सरोवर गर्मी के मौसम में सूख जाते हैं, महिला समूहों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता और जल संकट यथावत बना रहता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन अमृत सरोवरों से अमृत किसे मिला?
अब आवश्यकता केवल नए तालाब बनाने की नहीं, बल्कि पहले से बने अमृत सरोवरों की गुणवत्ता, जलधारण क्षमता और उपयोगिता की निष्पक्ष समीक्षा करने की है, ताकि सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक पहुंच सके और जल संरक्षण का उद्देश्य कागजों से निकलकर धरातल पर दिखाई दे।
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