मेरठ 29 June (Rns) | भाजपा और रालोद के बीच आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे की राह आसान नहीं लग रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दोनों दलों का यह गठबंधन ऊपर से जितना मजबूत दिख रहा है, चुनाव पास आते ही सीटों के गणित को लेकर उतना ही उलझता जा रहा है। दोनों ही पार्टियां अपने राजनीतिक वजूद को बचाने और बढ़ाने की कोशिशों में लगी हैं। यही वजह है कि मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर और गाजियाबाद जैसे जिलों में सीटों का तालमेल इस गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
साल 2027 के चुनाव की तैयारियों के साथ ही दोनों दलों के भीतर सीटों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। दोनों पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ने के पक्ष में तो हैं, लेकिन कई जिलों की सीटों पर दोनों के बीच पेंच फंसना तय है। रालोद अपनी राजनैतिक पकड़ मजबूत करने के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटों पर दावा कर रहा है, जबकि भाजपा अपनी जीती हुई और मजबूत सीटों को किसी भी कीमत पर छोड़ने के मूड में नहीं है।
मेरठ, बागपत और मुजफ्फरनगर पर टिकीं सबसे ज्यादा निगाहें
मेरठ जिले की सिवालखास सीट को रालोद के खाते में माना जा रहा है क्योंकि वहां से गुलाम मोहम्मद मौजूदा विधायक हैं। इसके अलावा रालोद किठौर और सरधना सीटों पर भी हक जता सकता है। हालांकि, भाजपा इन दोनों क्षेत्रों को अपना मजबूत गढ़ मानती है। सरधना से पूर्व विधायक संगीत सोम भाजपा का बड़ा चेहरा हैं, जबकि किठौर में सत्यवीर त्यागी पिछले चुनाव में बेहद कम अंतर से हारे थे। इसलिए इन सीटों पर सहमति बनना मुश्किल लग रहा है

