-किसान क्राफ्ट ने दिखाया सूखे सीधी बुवाई धान का मॉडल
सुलतानपुर 13 नवंबर (आरएनएस )। कुड़वार क्षेत्र के गोविंदपुर मखदूमपुर में किसानों के लिए सूखे सीधी बुआई पर आधारित एक किसान गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी में आलोक जैन ने किसानों को सूखे सीधे बीज वाले धान के बारे में बताते कहा कि सूखे धान की खेती के लिए आवश्यक पानी की तुलना में 50्र कम पानी का उपयोग करना पड़ता है और उर्वरक, कीटनाशकों, श्रम लागत और ग्रीनहाउस गैस (मीथेन) उत्सर्जन की मात्रा को कम करता है। एक किलोग्राम पारंपरिक धान उत्पादन के लिए 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि सूखे प्रत्यक्ष बीज वाले धान के लिए 2,000-2,500 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यह फसल कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि सूखा प्रत्यक्ष बीजित धान सूखे खेतों में सूखा प्रत्यक्ष बीजारोपण है। खेतों में पोखर डालने की जरूरत नहीं है द्य फसल चक्रण संभव है। दालों, सब्जियों और तिलहनों के साथ सह फसल भी संभव है। लंबे समय में इससे मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है। किसानों को आगे बताया कि धान की खेती और उत्पादन का भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान है। पानी की कमी और ज्ञान की कमी जैसी विभिन्न समस्याएं और मुद्दे इस फसल के उत्पादन पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं, जो हमारी अर्थव्यवस्था के विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। धान की फसल के खिलाफ बढ़ती समस्याओं से निपटने के लिए, हमने किसान क्राफ्ट में ड्राई डायरेक्ट सीडेड राइस की नई किस्में विकसित की हैं, जो समान उत्पादन के साथ 50्र कम पानी की खपत करती हैं। संतोष यादव ने कहा कि सूखे सीधे बीज वाले धान का उपयोग करके किसान मिट्टी की उर्वरकता के आधार पर अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं। पारंपरिक धान की किस्मों की तुलना में स्वाद में कोई बदलाव किए बिना इस धान को सीधे बोया जा सकता है जिसके परिणामस्वरूप धान की फसल की उत्पादकता में वृद्धि होने के साथ क्योंकि खर्च में काफी कमी आती है। सूखे सीधे बीज वाले धान की खेती का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसमें नर्सरी, पोखरिंग, समतलीकरण और रोपाई की आवश्यकता नहीं होती है। यह पर्यावरण के अनुकूल भी है। लागत प्रभावी फसल होने के साथ-साथ कम मीथेन उत्सर्जन पैदा करती है। गोष्ठी में संतोष कुमार, दीपक सिंह ,जितेन्द्र राय आदि ने अपना विचार व्यक्त किए।
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