नैनीताल ,15 फरवरी (आरएनएस)। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने के बाद अगर शादी का वादा टूट जाता है, तो उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने साफ किया है कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं, तो आईपीसी की धारा 376 के तहत रेप का मामला तभी बन सकता है, जब यह ठोस रूप से साबित हो कि शादी का वादा शुरुआत से ही पूरी तरह से झूठा था।
मसूरी की महिला से जुड़ा है यह पूरा मामला
यह पूरा कानूनी विवाद मसूरी की एक महिला से जुड़ा है। महिला ने सूरज बोरा नाम के एक व्यक्ति पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का गंभीर आरोप लगाया था। महिला का कहना था कि सूरज ने उसे 45 दिनों के भीतर शादी करने का भरोसा दिया था, लेकिन बाद में वह अपनी बात से मुकर गया। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने जांच पूरी की और आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी। इसी चार्जशीट और अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को सूरज बोरा ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत में बचाव पक्ष और अभियोजन की दलीलें
इस मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने मजबूती से तर्क दिया कि दोनों पक्ष वयस्क हैं और लंबे समय से आपसी सहमति के साथ रिश्ते में थे। एफआईआर में ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है जो यह साबित करे कि रिश्ते की शुरुआत में आरोपी का इरादा धोखा देने का था। बचाव पक्ष के वकील ने इसे महज एक ‘असफल रिश्ताÓ करार दिया और कहा कि इसके लिए आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। दूसरी ओर, राज्य सरकार और पीडि़ता के वकीलों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि महिला की सहमति पूरी तरह से शादी के वादे पर ही टिकी थी। उन्होंने यह भी कहा कि वादा शुरू से झूठा था या नहीं, यह ट्रायल (मुकदमे) के दौरान सबूतों के आधार पर ही तय हो सकता है, इसलिए केस को रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
रिश्ते का शादी में न बदलना अवैध नहीं: जस्टिस नैथानी
जस्टिस आशीष नैथानी ने दोनों पक्षों की दलीलें और मामले की गहराई से सुनवाई करने के बाद अपनी अहम टिप्पणी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी वयस्क महिला द्वारा दी गई सहमति सिर्फ इसलिए अमान्य या अवैध नहीं हो जाती क्योंकि वह रिश्ता अंतत: शादी के मुकाम तक नहीं पहुंच सका। कोर्ट ने कहा कि धारा 376 के तहत इसे तभी अपराध माना जाएगा, जब यह साबित हो कि शादी का वादा केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमति हासिल करने का एक जरिया मात्र था और आरोपी का शादी करने का पहले दिन से ही कोई इरादा नहीं था।
हाई कोर्ट ने रद्द की चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही
हाई कोर्ट ने पूरे मामले के तथ्यों का अवलोकन करने के बाद पाया कि दोनों पक्ष एक लंबे समय से रिश्ते में थे और उनके बीच कई बार शारीरिक संबंध बने थे। अदालत के अनुसार, यह स्थिति शुरुआत से ही धोखाधड़ी होने के बजाय आपसी सहमति की ओर साफ इशारा करती है। कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि बिना किसी ठोस आधार के आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना आरोपी का बेवजह उत्पीडऩ करना होगा। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित आपराधिक मामले और सूरज बोरा के खिलाफ 22 जुलाई 2023 को दायर की गई चार्जशीट को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
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